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The Ramayana-Family and Classroom PowerPoint Presentation

worldwideweb By : worldwideweb

On : Jul 26, 2014

In : Education & Training

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  • Slide 1 - रामचरित्रमानस, परिवार और कक्षा कक्षागत प्रक्रियाओं मे सत्ता की अनिवार्यता के वैचारिक संरचना को धमतरी जिले के शिक्षक समूह के संदर्भ में समझना
  • Slide 2 - राष्ट्रिय पाठ्यचर्या की रूपरेखा- 2005 “सीखने की क्षमता देने वाला वातावरण वह होता है जहां बच्चे सुरक्षित महसूस करते है, जहां भय का कोई स्थान नहीं होता है और स्कूली रिश्तों में बराबरी और जगह में समता होती है। बहुधा इसके लिए शिक्षक को कुछ विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। सिवाय बराबरी का व्यवहार करने और बच्चों में भेदभाव ना करने के”। “भागीदारी का अपने आप में कोई अर्थ नहीं होता है। भागीदारी के चारों तरफ जो वैचारिक ढांचा होता है वही उसको राजनीतिक संरचना देता है। उदाहरण के लिए, एक सत्तावादी ढांचे में भागीदारी का अर्थ प्रजातन्त्र में भागीदारी से काफी अलग होता है”।
  • Slide 3 - अध्ययन का उद्देश्य धमतरी जिले के शिक्षक समुदाय मे कक्षा शिक्षण मे सत्ता की अनिवार्यता को लेकर जिस प्रकार की स्वीकार्यता थी उसके वैचारिक आधारों एवं इसके कक्षागत व्यवहार से जुड़े हुए प्रक्रियाओं को समझना: अध्ययन केप्रथम चरण में सत्ता की अनिवार्यता से जुड़े हुए कारको एवं वैचारिक संरचना को व्यापक सामाजिक संरचना के साथ समन्धों के संदर्भ में शिक्षकों के नजरिए से समझने की कोशिश कीगयी है। इस अधध्यन के अगले चरण में कक्षागत प्रक्रियाओं के अंदर जारी शक्ति संरचना एवं इस प्रक्रियाओं के एक हिस्से के रूप में छात्र समुदाय के दृस्टिकोन से की जाएगी।
  • Slide 4 - सूचना संग्रहण की प्रविधि प्रथम चरण में शिक्षकों से लिखित रूप में राय लिया गया की भय दंड के प्रति आपका क्या दृस्टिकोन है। इस चरण मे open ended प्रश्नो के साथ चार सामूहिक परिचर्चाए की गयी। यह परिचर्चा नवननियुक्त शिक्षको, डी एड के अंतिम वर्ष के छात्र-छात्राओं , प्राथमिक एवं उच्चतर प्राथमिक शिक्षकों के साथ आयोजित की गयी जिनमे कुल 56 शिक्षकों ने की। इन 56 शिक्षकों मे 23 शिक्षिकाओं और 33 शिक्षकों ने भागीदारी की। इस अध्ययन के दूसरे चरण में सत्ता की अपरिहार्यता के प्रति एक शिक्षक के नजरिए को ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश की गयी। प्रथम चरण मे प्राप्र्त जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर सामूहिक चर्चा एवं साक्षात्कार के लिए प्रश्नपत्रों को एक प्रारूप विकसित किया गया। Open ended question के साथ 6 शिक्षकों- शिक्षिकाओं से साक्षात्कार किए गए। अंत मे चार समूहिक परिचर्चाए धमतरी जिले के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षक समूहों के कुल 40 शिक्षकों साथ आयोजित की गयी। इन 40 शिक्षककों 17 शिक्षकाओं एवं 23 शिक्षकों ने भाग लिया।
  • Slide 5 - सत्ता की अनिवार्यता (समूहिक परिचर्चा, प्राथमिक शाला बंजारी, विकासखंड-कुरुद) “पहले समाज में सभी बड़ों का आदर करते थे। क्या मजाल जो की हम अपने गुरुजी के सामने नजर उठाकर बात कर ले। आजकल तो ऐसे ही बच्चे बिगड़ गए है। विद्यालय मे थोड़ा शासन होता था परंतु अब तो वह भी खत्म हो जाएगा”। ( D॰ ED द्वितीय वर्ष की एक छात्रा, समूहिक परिचर्चा, DIET नगरी) “मारने पीटने मे मेरा विचार नहीं है। इसमें मेरा विचार है की बच्चों को बिलकुल ना डांटे तो वह अनुशाषणहीन हो जाएंगे इसलिए बच्चों को थोड़ी बहुत डांटते रहना चाहिए. इससे बच्चों में अनुशाषन नहीं रहता है”। (समूहिक परिचर्चा, नवनियुक शिक्षक प्रशिक्षण, विकासखंड-धमतरी) “हाँ सत्ता होनी चाहिए क्यौकी जब हम एक शिक्षक है तो क्या हमको इतना भी हक नहीं बनाता है की उन्हे सुधारने के लिए एक थप्पड़ मारे। मेरे खयाल से एक दो थप्पड़ तो देने ही चाहिए। ताकि वो थोड़ा डर में रहे और काम अच्छे से करें। आखिर हमने तो मार खाकर भी शिक्षक को सम्मान देते है”।
  • Slide 6 - (समूहिक परिचर्चा, ब्लॉक संसाधन केंद्र, विकासखंड-मगरलोड) “यह आरुणि जैसे आज्ञाकारी शिष्य की भूमि है। गुरु और शिष्य के रिश्ते की हमारी अपनी परमपराए है और अपने विश्वास है। इस परम्पराओं का निर्वहन करके ही हम जगतगुरु बने थे”।   (UPS की एक शिक्षिका, समूहिक परिचर्चा, ब्लॉक संसाधन केंद्र, विकासखंड-मगरलोड) “कक्षा संचालन में सत्ता की आवश्यकता होती है। लेकिन इसका उपयोग एक सीमा मे रहकर हो ताकि बच्चों में थोड़ा सा डर रहे और हम अपने उड़ेश्यों को पूरा कर सकें जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सकें”। “कक्षा में दवाब होना चाहिए। बच्चे बिना दंड के शांत नहीं रहते है और पढ़ाई में भी ध्यान नहीं देते है। इससे बच्चों में अनुशाषन नहीं रहता है”।
  • Slide 7 - सत्ता के अपरिहार्यता को समझने के प्रारूप समाज के अंदर नियमन के लिए सत्ता की अनिवार्यता को देखने का नजरिया गुरु शिष्य परंपरा के रूप सत्ता की अनिवार्यता में देखने का नजरिया कक्षा संचालन की जरूरत के रूप सत्ता की अनिवार्यता को देखने का नजरिया समाजजिक संरचनाओं के अंदर की प्रचलित व्यवहार की निरंतरता मे सत्ता की अनिवार्यता को देखने का नजरिया
  • Slide 8 - समाज मे नियमन के लिए सत्ता की अनिवार्यता के रूप में देखना रामचरितमानस: भय बिन होत ना प्रीत गुसाई विनय न माने जलधी जड़, गये तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत॥ “अब सारे लोग पढ़ाई करेंगे तो खेत मे काम कौन करेगा। और सभी खेत मे कौन काम करने लगे तो पढ़ाई कौन करेगा। जाति ने समाज के अंदर कार्य विभाजन करके एक व्यवस्था बनाई जिसमे सबसे यह अपेक्षा की जाती है की सारे लोग अपना काम करेंगे। सभी अपना काम करे और इन कामों को नियंत्रित करने के लिए सत्ता तो आवश्यक है। अब समाज मे अगर कोई अपना काम नहीं करता है तो हम पंचायत बुलाते है और उसको दंडित करते है। इसी प्रकार कक्षा के बच्चे पढ़ाई करें इसके लिए कक्षा मे शिक्षक को सत्ता की आवश्यकता है। अगर बच्चा नहीं पढ़ेगा तो उसकी पिटाई होनी चाहिए”। अनुशासन = आज्ञाकारिता
  • Slide 9 - गुरु शिष्य परंपरा के रूप सत्ता की अनिवार्यता को देखना शिष्य आरुणि की कहानी “घनघोर बारिश हो रही थी। गुरु ने आरुणि को खेत के पानी को रोकने के लिए कहा। खेत का मेड़ टूट जाता है और आरुणि उस टूटे मेड़ की जगह पर लेट कर सारी रात खेतों के पानी को रोके रखता है। सुबह गुरु जब खेतों पर आते है तो आरुणि के गुरुभक्ति को देखकर प्रसन्न होते है”। गुरुर ब्रह्मा, गुरूर विष्णु, गुरूर देवों महेश्वराय। गुरूर साक्षात परम ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुए नमः॥   गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पाँव बलहारी गुरु आपने जो गोविंद दियो बताए॥ “आजतक गुरु शिष्य की परंपरा में कोई समस्या नजर नहीं आई। पता नहीं कौन सा ज्ञान बन गया है की एक शिक्षक किसी बच्चे को एक थप्पड़ नहीं मार सकता है। हमारे जमाने में पढ़ाई नहीं होती थी क्या ? पहले के सारे लोग वेबकूफ थे”।
  • Slide 10 - कक्षा संचालन की जरूरत के रूप में देखना (सामूहिक परिचर्चा, प्राथमिक शाला बंजारी) “भाई कक्षा में कैसे कैसे बच्चे आते है यह कोई नहीं जानता है। अब सारे बच्चे तो शांत नहीं होते है। दो मिनट के लिए कक्षा से निकाल जाओ तो पूरे विद्यालय को मछली बाज़ार बना देते है। सरकार को क्या है बैठे बैठाए नियम बनाती रहती है। भुगतना तो शिक्षक को पड़ता है”। (UPS की एक शिक्षिका, समूहिक परिचर्चा, ब्लॉक संसाधन केंद्र, विकासखंड-मगरलोड) “कक्षा में एक बच्चा दूसरे को सिर फोड़ दे तो क्या उसको शाबाशी दी जाएगी? कक्षा का संचालन करना क्या इतना सरल है? बच्चे को विद्यालय भेज कर सब निश्चिंत हो जाना चाहते है। सारी मुसकिलें तो शिक्षकों के सर आती है? क्या घर पर बच्चों की पिटाई नहीं होती है”? “पहली-दूसरी कक्षाओं मे अगर बच्चे पहाड़ा याद कर ले तो आगे गणित मे बहुत सहायता मिलती है। मै अपने कक्षाओं मे बच्चों को पहाड़ा रटाने के लिए बहुत मेहनत करता हूँ और जरूरत पड़ने पर पिटाई भी करता हूँ”।
  • Slide 11 - समाजजिक संरचनाओं के अंदर की प्रचलित व्यवहार की निरंतरता में देखना “बच्चे तो हमारे बगिया के फूल है और शिक्षक एक मालिक है। अब फूल के विकास के लिए कई बार उसके डालियों को अनियंत्रित होने पर काटना भी पड़ता है। अब अगर माली सींचने का कर्तव्य पूरा कर रहा है तो उसे पौधे को नियंत्रित करने का भी अधिकार है। अब घर पर पिता की बात करें तो क्या वह पिटाई नहीं करते है। बड़े भाई, मा सारे बच्चे का भला ही चाहते है। इसलिए जरूरत पड़ने पर पिटाई भी करते है। अब कोई शिक्षक अपने छात्र का बुरा तो नहीं सोच सकता है ना। वह तो उसके भलाई के लिए थोड़ा बहुत पिटाई कर देता है”। मगरलोड ब्लॉक की एक शिक्षिका ने पालकों के द्वारा भय और शारीरिक दंड को विद्यालय में लागू करने के आग्रह के घटनाओं को शेयर करते हुए कहा की अगर स्वतंत्र व्यक्तिव वाले बच्चे घर पर स्वतंत्र व्यवहार करने लगते है तो पालकों की शिकायत आती है विद्यालय के अंदर बच्चों पर शासन नहीं किया जाता है।
  • Slide 12 - निष्कर्ष अगर उपरोक्त विवेचन को समग्रता में देखें तो यह कहा जा सकता है की विद्यालय के अंदर सत्ता का स्वरूप विद्यालय के भीतर की जरूरत या शिक्षण प्रक्रियाओं से केवल नहीं तय हो रही है बल्कि विद्यालय के बाहर के पारिवारिक-सामाजिक- सामाजिक- सांस्कृतिक संरचना प्रभुत्वशाली विचारधाराओं से प्रभावित हो रहा है। समाज के भीतर की यह सत्तावादी विचारधारा जहां एक और औचित्य संस्कृति के विभिन्न रूपों मे, महाकाव्यों के नायक- नायिकाओं एवं उनके कार्यों के आदर्श प्रतिमानों मे ढूंढती है वही तो दूसरी तरफ पारिवारिक और सामाजिक संरचना मे प्रचलित सत्तावादी व्यवस्थाओं के जुड़कर अपनी सार्थकता को कक्षागत प्रक्रियाओं के संदर्भ मे परिभाषित करने लगती है। यहाँ पर सत्ता के अपरिहार्यता की सोच अपने आप मे एक विचारधारात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेती है। शिक्षक भी इसी समाज का सदस्य होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया मे वह समाज के अंदर व्याप्त सत्ता के अपरिहार्यता को विविध रूपों मे महसूस करता है। एक शिक्षक, शिक्षा और विद्यालय जिस विचारधारात्मक ढांचे मे अपने उदेश्य को परिभाषित करती है, उसको महसूस नहीं कर पता है और समाज के अंदर सीखने- सीखाने के परंपरागत शिक्षाशास्त्र को प्रैक्टिस करता है। लोकतान्त्रिक विद्यालय और शिक्षा पद्धति के वैचारिक ढांचे के बिना लोकतान्त्रिक कक्षा संचालन की व्यवस्था की प्रैक्टिस एक कोरी कल्पना प्रतीत होती है और इसके बगैर राज्य के प्रगतिशील कानून एक प्रकार से बाध्यता बन जाती है जिसको एक शिक्षक ढोता है।
  • Slide 13 - Thanks

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